एपिसोड 1: सितार का परिचय

एपिसोड 1: सितार का परिचय : सितार दुनिया के सबसे लोकप्रिय वाद्ययंत्र में से एक है। सितार शब्द का अर्थ तीन तारों का समागम होता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह फारसी शब्द से आया है। सितार के बारे में 13वीं सदी के फारसी वाद्ययंत्रों “सेहतर”, “कचुआ / कच्छप” वीना या तानपुरा-सेहतर वीना से सितार की उत्पत्ति हुई है ऐसा माना जाता हैं।

सितार का परिचय - Sitar, Music Instrument | সেতার, বাদ্যযন্ত্র | सितार, संगीत वाद्ययंत्र
Sitar, Music Instrument | সেতার, বাদ্যযন্ত্র | सितार, संगीत वाद्ययंत्र

हालांकि इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं है, लेकिन सितार के आविष्कारक की उपाधि मिया तानसेन के वंश के 16वीं सदी के सूफी संगीतकार अमीर खुसरो को दी गई है। बाद में, एक ही परिवार के दो सदस्यों, मासीद खान और राजा खान ने सितार के वाद्य शैली के विशेष बदलाव में योगदान दिया। विभिन्न ऐतिहासिक सितार कलाकारों ने सितार को युग के साथ ढालकर एक अलग पहचान देने की हमेशा से कोशिश की है, और सफल भी रहे हैं।

[ एपिसोड 1: सितार का परिचय ]

https://youtu.be/-Z7W7EgRhPk   इस क्षेत्र में, गायन संगीत को संगीत का उच्चतम दर्जा दिया गया था। किसी कारण से, उपमहाद्वीप के लगभग सभी वाद्ययंत्र, गायन शैली पर निर्भर थे, और आमतौर से गायन शैली में स्वरों की सीमा तीन सप्तक से अधिक नहीं जा पाती है। इस क्षेत्र के लगभग सभी वाद्ययंत्र की शुरुआत विभिन्न संगीत क्षेत्रों में संगत करने के रूप से प्रचलित हुई। एकल विषय होने के लिए, प्रत्येक वाद्ययंत्र को साधना के साथ साथ संघर्ष से भी गुज़रना पड़ा।

Sitar, Music Instrument | সেতার, বাদ্যযন্ত্র | सितार, संगीत वाद्ययंत्र
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“घराना” शब्द अक्सर शुद्ध संगीत में सुना जाता है। “घर” शब्द से आया है “घराना” आमतौर पर एक निश्चित शैली को संदर्भित करता है, जो अपने आप में ही एक विशिष्ट शैली हो। सितार के ऐसे लगभग दस घराने हैं, इमदादखानी / इटावा / विलायतखानी घराना और मैहर घराना सितार के सबसे लोकप्रिय घराने हैं। सितार की दो वादन शैली में, आवाज़ का प्रवाह/ज्वारी, तार का संयोजन और शारीरिक और आंतरिक तकनीक एक दूसरे से बहुत अलग होती हैं। इस सदी के दो महान सितार कलाकार, इम्दादखानी घराने के उस्ताद विलायत खान और सेनिया मैहर घराने के सितार वादक पंडित रविशंकर के हाथों ही विश्व प्रसिद्ध हुई एवं सितार ने अपना सर्वशेष रूप धारण किया। उस्ताद विलायत खान के वाद्य शैली को “गायकी/”गायन” अंग कहा जाता है और पंडित रविशंकर के वाद्य शैली को “तंत्रकारी” अंग कहा जाता है।

Sitar, Music Instrument | সেতার, বাদ্যযন্ত্র | सितार, संगीत वाद्ययंत्र
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एक विशेष प्रकार का कद्दू, जर्मन चांदी के पर्दे (फ्रेट), प्रसंस्कृत लकड़ी, एक विशेष प्रकार का सूत/धागा और हड्डी/तांबा, सितार बनाने की मुख्य सामग्री हैं। दुनिया भर में सितार और तानपुरा की अच्छी मांग के कारण, इस विशेष प्रकार के कद्दू की खेती भारत में की जाती है। सितार की आवाज़ में इस कद्दू की खास भूमिका है, ये कद्दू खाने के उपयोगी नहीं होता। जब कद्दू एक निश्चित अवस्था में पहुंच जाता है, तो इसे सितार बनाने के लिए उपयुक्त बनाने के लिए इसे एक विशेष प्रक्रिया में सुखाकर आकार दिया जाता है। सितार आमतौर पर “तून” लकड़ी या “सागौन” की लकड़ी से बना होता है। यद्यपि दो प्रकार की लकड़ी की अलग-अलग विशेषताएं होती हैं, क्योंकि सागौन की लकड़ी का बना सितार मज़बूत होने के कारण उसके आर्द्रता में परिवर्तन होता है, इससे सितार पर इसका प्रभाव बाद में बहुत कम होता है। सितार बनने से पहले इस लकड़ी को कई सालों तक इंतजार करना पड़ता है।

Sitar, Music Instrument | সেতার, বাদ্যযন্ত্র | सितार, संगीत वाद्ययंत्र
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एक विशेष प्रक्रिया में लंबे समय तक रखे जाने पर लकड़ी के अंदर नमी की मात्रा बहुत कम हो जाती है, और जब यह एक सितार में परिवर्तित हो जाता है, तो इसकी ध्वनि की गंभीरता उतनी ही मनमोहक होती है। ब्रैंड वैल्यू के अलावा, सितार के बाज़ारी मूल्य का एक बड़ा हिस्सा सितार की लकड़ी की उम्र पर निर्भर करता है। लकड़ी जितनी पुरानी होगी, सितार की कीमत भी उतनी ही अधिक होगी। सितार के प्रारंभिक काल में उसके कद्दू और लकड़ी को घिसकर, एक खास तरीके से उसके भीतर का हिस्सा खाली/खोखला बनाया जाया है। घराना एवं सितार के प्रकार के आधार पर, सितार में 18-21 तार हो सकते है। इसके बीच में एक मूल तार छोड़कर 6-7 मुख्य तार होते हैं। बाकी सब कुछ आंतरिक स्तर पर है, जिसका मुख्य कार्य विभिन्न स्वरों के साथ प्रतिध्वनित करना। इस स्तर को “तरफ” या “तरफदार” कहा जाता है। इन सभी तारो को पकड़कर रखने के लिए, उनके अनुसार छेद बनाकर उसमें उपायुक्त आकार के “कान” वाह “खूँटी” बनाए जाते है, जो इन सभी तारो को बांध कर रखती है। एक बार सितार का असली रूप बन जाने के बाद, कलाकार इस वाद्ययंत्र को बहुत महीने लगाकर इसमें कारीगरों की मदद से हस्तकरिता करवाते है, कुछ हस्तकारीता बहुत ही हल्के पैमाने पर की जाती है, और कुछ काफी गहराई के साथ नक़्क़ाशीदार बनाया जाता है।

Sitar, Music Instrument | সেতার, বাদ্যযন্ত্র | सितार, संगीत वाद्ययंत्र
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निर्धारित दूरी पर पर्दों/फ्रेट को बांधने से ठीक पहले एक विशेष लेप और सूत से वार्निश/पेंट किया जाता है। तब सितार में “पुल”/”ब्रिज” स्थापना की जाती है। आमतौर पर वाद्ययंत्रों में एक तरह का सेतु/ब्रिज होता है। इस ब्रिज का मुख्य काम तारो के वाइब्रेशन को यंत्र के अंदर पहुंचाने का होता है। सितार में इसकी भूमिका काफी प्रभावाशाली है, लेकिन ये ब्रिज अलग अलग वाद्ययंत्रों में अलग अलग तरह काम आती है। सितार का यह ब्रिज, हड्डी, सींग, हाथीदांत और लकड़ी के बने होते है, हालांकि, इन दिनों “सेलुलॉयड” के बने ब्रिज काफी लोकप्रिय हो गए हैं। कई सितार में एक गोल आकार की वस्तु लगी रहती है जो गले से जुड़ी होती है। इसे तुम्बा के नाम से जाना जाता है। सभी सितार में तुम्बा नहीं होता। इस तुम्बा का कोई खास काम नही होता, ये सिर्फ बाहरी सजावट के काम आता है। ये तुम्बा हमे आमतौर पर रवि शंकर स्टाइल या सेनिया मैहर घराने के सितार वादको के सितार पर देखने मिलती हैं। चूंकि सितार दुनिया में एक बहुत लोकप्रिय वाद्ययंत्र है, इसलिए यह किसी भी संगीत वाद्ययंत्र की दुकान में मिलने की अधिक संभावना है। वैसे तो पूरे विश्व में इसकी मांग है, लेकिन इसका मुख्य उत्पादन भारत में होता है। भारत में ऐसे सैकड़ों कारीगर हैं जो सितार बनाते है।

Sitar, Music Instrument | সেতার, বাদ্যযন্ত্র | सितार, संगीत वाद्ययंत्र
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भारत के सबसे पुराने सितार कारीगर कोलकाता के “हिरेन रॉय” और दिल्ली के “रिखी राम” हैं। स्वाभाविक रूप से, वहा बने सितार काफी महंगे होते है। यहा पचास हजार से लेकर एक लाख से अधिक तक के सितार पाए जाते हैं। एक शब्द में कहें तो यहां बनने वाले सितार अपने आप में ही असाधारण होते हैं। उस्ताद विलायत खान और पंडित रविशंकर सहित कई विश्व स्तरीय सितार कलाकारों ने यहां से बने सितार को बजाया है। इन दो ब्रांड के अलावा कोई भी अच्छा सितार नहीं बना सकता, ऐसा बिल्कुल भी नही है। पूरे भारत में कई प्रतिभाशाली सितार कारीगर हैं। उनमें से कई समूह के रूप में भारत के दिल्ली में स्थित मिराज शहर में हैं। ढूंढने पर उन सभी को आसानी से ऑनलाइन पाया जा सकता है। सितार बजाने के लिए, सितार के अलावा एक विशेष तरह के छल्ले की ज़रूरत पड़ती है जिसे “मिजराब” कहा जाता है, तरफ के तार को घुमाने के लिए भी एक विशेष चाबी की जरूरत होगी और एक छोटा सा बॉक्स ताकि हल्के तेल में रूई डुबाई जा सके। सितार गुरुकुल के पहले एपिसोड में, निशित दे इन सभी मुद्दों पर चर्चा करते हैं। आप सभी का स्वागत है इस विशेष कड़ी में।

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